सुवर्णवर्णसुन्दरं
सितैकदन्तबन्धुरं
गृहीतपाशकाङ्कुशं
वरप्रदाभयप्रदम्।
चतुर्भुजं त्रिलोचनं
भुजङ्गमोपवीतिनं
प्रफुल्लवारिजासनं
भजामि सिन्धुराननम्॥
किरीटहारकुण्डलं
प्रदीप्तबाहुभूषणं
प्रचण्डरत्नकङ्कणं
प्रशोभिताङ्घियष्टिकम्।
प्रभातसूर्यसुन्दराम्बरद्वयप्रधारिणं
सरत्नहेमनूपुरप्रशोभिताङ्घ्रिपङ्कजम्॥
सुवर्णदण्डमण्डितप्रचण्डचारुचामरं
गृहप्रदेन्दुसुन्दरं
युगक्षणप्रमोदितम्।
कवीन्द्रचित्तरञ्जकं
महाविपत्तिभञ्जकं
षडक्षरस्वरूपिणं भजे
गजेन्द्ररूपिणम्॥
विरिञ्चविष्णुवन्दितं
विरूपलोचनस्तुतं
गिरीशदर्शनेच्छया समर्पितं
पराम्बया।
निरन्तरं सुरासुरै:
सपुत्रवामलोचनै:
महामखेष्टकर्मसु स्मृतं
भजामि तुन्दिलम्॥
मदौघलुब्धचञ्चलालिमञ्जुगुञ्जितारवं
प्रबुद्धचित्तरञ्जकं
प्रमोदकर्णचालकम्।
अनन्यभक्तिमानवं
प्रचण्डमुक्तिदायं
नमामि नित्यमादरेण
वक्रतुण्डनायकम्॥
दारिद्रयविद्रावणमाशु
कामदं स्तोत्रं
पठेदेतदजस्त्रमादरात्।
पुत्री कलत्रस्वजनेषु
मैत्री पुमान्
भवेदेकवरप्रसादात्॥
अर्थ
जो सुवर्ण के समान गौर वर्ण
से सुन्दर प्रतीत होते हैं ;
एक ही श्वेत दन्त के
द्वारा मनोहर जान पडते हैं;
जिन्होंने हाथों में पाश
और अङ्कुश ले रखे हैं ; जो वर
तथा अभय प्रदान करनेवाले
हैं ; जिनके चार भुजाएँ और
तीन नेत्र हैं; जो सर्पमय
यज्ञोपवीत धारण करते हैं
और प्रफुल्ल कमल के आसन पर
बैठते हैं , उन गजानन का मैं
भजन करता हूँ। जो किरीट,
हार और कुण्डल के साथ
उद्दीप्त बाहुभूषण धारण
करते हैं ; चमकीले
रत्नों का कंगन पहनते हैं;
जिनके दण्डोपम चरण अत्यन्त
शोभाशाली हैं ,
जो प्रभातकाल के सूर्य के
समान सुन्दर और लाल
दो वस्त्र धारण करते हैं
तथा जिनके युगल चरणारविन्द
रत्नजटित सुवर्णनिर्मित
नुपूरों से सुशोभित हैं , उन
गणेशजी का मैं भजन
करता हँू। जिनका विशाल एवं
मनोहर चँवर सुवर्णमय दण्ड
से मण्डित है ; जो सकाम
भक्तों को गृह-सुख प्रदान
करनेवाले एवं चन्द्रमा के
समान सुन्दर हैं ; युगों में
क्षण का आनन्द लेनेवाले
हैं ; जिनसे कवीश्वरों के
चित्त का रञ्जन होता है;
जो बडी-
बडी विपत्तियों का भञ्जन
करनेवाले और षडक्षर
मन्त्रस्वरूप हैं , उन
गजराजरूपधारी गणेश का मैं
भजन करता हूँ। ब्रह्मा और
विष्णु
जिनकी वन्दना तथा विरूपलोचन
शिव जिनकी स्तुति करते हैं ;
जो गिरीश (शिव) के दर्शन
की इच्छा से
परा अम्बा पार्वती द्वारा समर्पित
हैं ; देवता और असुर अपने
पुत्रों और
वामलोचना पत्िनयों के साथ
बडे -बडे यज्ञों तथा अभीष्ट
कर्मो में निरन्तर
जिनका स्मरण करते हैं; उन
तुन्दिल देवता गणेश का मैं
भजन करता हूँ।
जिनकी मदराशिपर लुभाये हुए
चञ्चल भ्रमर मञ्जु
गुञ्जारव करते रहते हैं ;
जो ज्ञानीजनों के चित्त
को आनन्द प्रदान करनेवाले
हैं ; अपने कानों को सानन्द
हिलाया करते हैं और अनन्य
भक्ति रखनेवाले
मनुष्यों को उत्कृष्ट
मुक्ति देनेवाले हैं , उन
वक्रतुण्ड गणनायक का मैं
प्रतिदिन आदरपूर्वक भजन
करता हूँ। यह स्तोत्र
दरिद्रता को शीघ्र
भगानेवाला और अभीष्ट वस्तु
को देनेवाला है। जो निरन्तर
आदरपूर्वक इसका पाठ करेगा,
वह मनुष्य एकेश्वर गणेश
की कृपा से पुत्रवान्
तथा स्त्री एवं स्वजनों के
प्रति मित्रभाव से युक्त
होगा।
Saturday, February 12, 2011
माँ दुर्गा चालीसा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो अंबे दुख हरनी॥
निरंकार है
ज्योति तुम्हारी। तिहूँ
लोक फैली उजियारी॥
ससि ललाट मुख महा बिसाला।
नेत्र लाल भृकुटी बिकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरस करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लय कीन्हा।
पालन हेतु अन्न धन दीन्हा॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नासन हारी। तुम
गौरी शिव शङ्कर प्यारी॥
शिवजोगी तुम्हरे गुन
गावें। ब्रह्मा विष्णु
तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वति को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन्ह
उबारा॥
धरा रूप नरसिंह को अंबा।
परगट भई फाड कर खंबा॥
रच्छा करि प्रह्लाद बचाओ।
हिरनाकुस को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
छीर सिन्धु में करत बिलासा।
दया सिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में
तुम्हीं भवानी। महिमा अमित
न जाय बखानी॥
मातंगी धूमावति माता।
भुवनेस्वरि बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिनि।
छिन्नभाल भव दु :ख
निवारिनि॥
केहरि बाहन सोह भवानी।
लांगुर बीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खडग बिराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और तिरसूला।
जाते उठत शत्रु हिय सूला॥
नगरकोट में तुम्ही बिराजत।
तिहूँ लोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम
मारे। रक्त बीज संखन
संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल काली को धारा। सेन
सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ संतन पर जब जब। भई
सहाय मातु तुम तब तब॥
अमर पुरी औरों सब लोका। तव
महिमा सब रहै असोका॥
ज्वाला में है
ज्योति तुम्हारी। तुम्हें
सदा पूजें नरनारी॥
प्रेम भक्ति से जो जस गावै।
दुख दारिद्र निकट नहि आवै॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन
लाई। जन्म मरन
ताको छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
जोग न हो बिन
शक्ति तुम्हारी॥
शङ्कर आचारज तप कीन्हो। काम
क्रोध जीति सब लीन्हो॥
निसिदिन ध्यान धरो शङ्कर
को। काहु काल
नहि सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप को मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
सरनागत ह्वै कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदंब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदंबा। दई
शक्ति नहि कीन्ह बिलंबा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरे दुख मेरो॥
आसा तृस्ना निपट सतावै।
रिपु मूरख
मोहि अति डरपावै॥
शत्रु नास कीजै महरानी।
सुमिरौं एकचित
तुमहि भवानी॥
करौ कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि सिद्धि दे करहु
निहाला॥
जब लगि जियौं दयाफल पाऊँ।
तुम्हरौ जस मैं
सदा सुनाऊँ॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परम पद पावै॥
देवीदास सरन निज जानी। करहु
कृपा जगदंब
भवानी॥
नमो नमो अंबे दुख हरनी॥
निरंकार है
ज्योति तुम्हारी। तिहूँ
लोक फैली उजियारी॥
ससि ललाट मुख महा बिसाला।
नेत्र लाल भृकुटी बिकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरस करत जन अति सुख पावे॥
तुम संसार शक्ति लय कीन्हा।
पालन हेतु अन्न धन दीन्हा॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नासन हारी। तुम
गौरी शिव शङ्कर प्यारी॥
शिवजोगी तुम्हरे गुन
गावें। ब्रह्मा विष्णु
तुम्हें नित ध्यावें॥
रूप सरस्वति को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन्ह
उबारा॥
धरा रूप नरसिंह को अंबा।
परगट भई फाड कर खंबा॥
रच्छा करि प्रह्लाद बचाओ।
हिरनाकुस को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
छीर सिन्धु में करत बिलासा।
दया सिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में
तुम्हीं भवानी। महिमा अमित
न जाय बखानी॥
मातंगी धूमावति माता।
भुवनेस्वरि बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिनि।
छिन्नभाल भव दु :ख
निवारिनि॥
केहरि बाहन सोह भवानी।
लांगुर बीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खडग बिराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और तिरसूला।
जाते उठत शत्रु हिय सूला॥
नगरकोट में तुम्ही बिराजत।
तिहूँ लोक में डंका बाजत॥
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम
मारे। रक्त बीज संखन
संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल काली को धारा। सेन
सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ संतन पर जब जब। भई
सहाय मातु तुम तब तब॥
अमर पुरी औरों सब लोका। तव
महिमा सब रहै असोका॥
ज्वाला में है
ज्योति तुम्हारी। तुम्हें
सदा पूजें नरनारी॥
प्रेम भक्ति से जो जस गावै।
दुख दारिद्र निकट नहि आवै॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन
लाई। जन्म मरन
ताको छुटि जाई॥
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
जोग न हो बिन
शक्ति तुम्हारी॥
शङ्कर आचारज तप कीन्हो। काम
क्रोध जीति सब लीन्हो॥
निसिदिन ध्यान धरो शङ्कर
को। काहु काल
नहि सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप को मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
सरनागत ह्वै कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदंब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदंबा। दई
शक्ति नहि कीन्ह बिलंबा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरे दुख मेरो॥
आसा तृस्ना निपट सतावै।
रिपु मूरख
मोहि अति डरपावै॥
शत्रु नास कीजै महरानी।
सुमिरौं एकचित
तुमहि भवानी॥
करौ कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि सिद्धि दे करहु
निहाला॥
जब लगि जियौं दयाफल पाऊँ।
तुम्हरौ जस मैं
सदा सुनाऊँ॥
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परम पद पावै॥
देवीदास सरन निज जानी। करहु
कृपा जगदंब
भवानी॥
Friday, February 11, 2011
॥ श्री सरस्वती चालीसा ॥
जय श्रीसकल बुद्घि बलरासी ।
जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥
जय जय जय वीणाकर धारी ।
करती सदा सुहंस सवारी ॥
रुप चतुर्भुज धारी माता ।
सकल विश्व अन्दर
विख्याता ॥
जग में पाप बुद्घि जब
होती । तबहि धर्म
की फीकी ज्योति ॥
तबहि मातु का निज अवतारा ।
पाप हीन करती महितारा ॥
बाल्मीकि जी थे हत्यारा ।
तव प्रसाद जानै संसारा ॥
रामचरित जो रचे बनाई ।
आदि कवि पदवी को पाई ॥
कालिदास जो भये विख्याता ।
तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥
तुलसी सूर आदि विद्घाना ।
और भये जो ज्ञानी नाना ॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा ।
केवल कृपा आपकी अमबा ॥
करहु कृपा सोई मातु भवानी ।
दुखित दीन निज
दासहिं जानी ॥
पुत्र करइ अपराध बहूता ।
तेहि न धरइ चित एकउ माता ॥
राखु लाज जननी अब मेरी ।
विनय करउं भांति बहुतेरी ॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा ।
कृपा करउ जय जय जगदम्बा ॥
मधुकैटभ जो अति बलवाना ।
बाहुयुद्घ विष्णु से
ठाना ॥
समर हजार पांच में घोरा ।
फिर भी मुख उनसे
नहीं मोरा ॥
मातु सहाय कीन्ह
तेहि काला । बुद्घि विपरीत
भई खलहाला ॥
तेहि ते मृत्यु भई खल
केरी । पुरवहु मातु मनोरथ
मेरी ॥
चण्ड मुण्ड जो थे
विख्याता । क्षण महु संहारे
उन माता ॥
रक्तबीज से समरथ पापी । सुर
मुन हृदय धरा सब कांपी ॥
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा ।
बार बार बिनवउं जगदंबा ॥
जगप्रसिद्घ जो शुंभ
निशुंभा । क्षण में बांधे
ताहि तूं अम्बा ॥
भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई
। रामचन्द्र बनवास कराई ॥
एहि विधि रावन वध तू
कीन्हा । सुन नर
मुनि सबको सुख दीन्हा ॥
को समरथ तव यश गुन गाना ।
निगम अनादि अनंत बखाना ॥
विष्णु रुद्र जस सकैं न
मारी । जिनकी हो तुम
रक्षाकारी ॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी ।
नाम अपार है दानवभक्षी ॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा ।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता ।
कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥
नृप कोपित को मारन चाहै ।
कानन में घेरे मृग नाहै ॥
सागर मध्य पोत के भंगे ।
अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में
। हो दरिद्र अथवा संकट में
॥
नाम जपे मंगल सब होई । संशय
इसमें करइ न कोई ॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै
छांड़ि पूजें एहि भाई ॥
करै पाठ नित यह चालीसा ।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ॥
धूपादिक नैवेघ चढ़ावै ।
संकट रहित अवश्य हो जावै ॥
भक्ति मातु की करै हमेशा ।
निकट न आवै ताहि कलेशा ॥
बंदी पाठ करै सत बारा ।
बंदी पाश दूर हो सारा ॥
रामसागर बांधि हेतु भवानी ।
कीजै कृपा दास निज जानी ॥
॥ दोहा ॥
मातु सूर्य कान्त तव,
अन्धकार मम रुप ।
डूबन से रक्षा करहु परुं न
मैं भव कूप ॥
बलबुद्घि विघा देहु मोहि,
सुनहु सरस्वती मातु ।
रामसागर अधम को आश्रय तू दे
दातु ॥
जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥
जय जय जय वीणाकर धारी ।
करती सदा सुहंस सवारी ॥
रुप चतुर्भुज धारी माता ।
सकल विश्व अन्दर
विख्याता ॥
जग में पाप बुद्घि जब
होती । तबहि धर्म
की फीकी ज्योति ॥
तबहि मातु का निज अवतारा ।
पाप हीन करती महितारा ॥
बाल्मीकि जी थे हत्यारा ।
तव प्रसाद जानै संसारा ॥
रामचरित जो रचे बनाई ।
आदि कवि पदवी को पाई ॥
कालिदास जो भये विख्याता ।
तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥
तुलसी सूर आदि विद्घाना ।
और भये जो ज्ञानी नाना ॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा ।
केवल कृपा आपकी अमबा ॥
करहु कृपा सोई मातु भवानी ।
दुखित दीन निज
दासहिं जानी ॥
पुत्र करइ अपराध बहूता ।
तेहि न धरइ चित एकउ माता ॥
राखु लाज जननी अब मेरी ।
विनय करउं भांति बहुतेरी ॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा ।
कृपा करउ जय जय जगदम्बा ॥
मधुकैटभ जो अति बलवाना ।
बाहुयुद्घ विष्णु से
ठाना ॥
समर हजार पांच में घोरा ।
फिर भी मुख उनसे
नहीं मोरा ॥
मातु सहाय कीन्ह
तेहि काला । बुद्घि विपरीत
भई खलहाला ॥
तेहि ते मृत्यु भई खल
केरी । पुरवहु मातु मनोरथ
मेरी ॥
चण्ड मुण्ड जो थे
विख्याता । क्षण महु संहारे
उन माता ॥
रक्तबीज से समरथ पापी । सुर
मुन हृदय धरा सब कांपी ॥
काटेउ सिर जिम कदली खम्बा ।
बार बार बिनवउं जगदंबा ॥
जगप्रसिद्घ जो शुंभ
निशुंभा । क्षण में बांधे
ताहि तूं अम्बा ॥
भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई
। रामचन्द्र बनवास कराई ॥
एहि विधि रावन वध तू
कीन्हा । सुन नर
मुनि सबको सुख दीन्हा ॥
को समरथ तव यश गुन गाना ।
निगम अनादि अनंत बखाना ॥
विष्णु रुद्र जस सकैं न
मारी । जिनकी हो तुम
रक्षाकारी ॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी ।
नाम अपार है दानवभक्षी ॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा ।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता ।
कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥
नृप कोपित को मारन चाहै ।
कानन में घेरे मृग नाहै ॥
सागर मध्य पोत के भंगे ।
अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में
। हो दरिद्र अथवा संकट में
॥
नाम जपे मंगल सब होई । संशय
इसमें करइ न कोई ॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै
छांड़ि पूजें एहि भाई ॥
करै पाठ नित यह चालीसा ।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ॥
धूपादिक नैवेघ चढ़ावै ।
संकट रहित अवश्य हो जावै ॥
भक्ति मातु की करै हमेशा ।
निकट न आवै ताहि कलेशा ॥
बंदी पाठ करै सत बारा ।
बंदी पाश दूर हो सारा ॥
रामसागर बांधि हेतु भवानी ।
कीजै कृपा दास निज जानी ॥
॥ दोहा ॥
मातु सूर्य कान्त तव,
अन्धकार मम रुप ।
डूबन से रक्षा करहु परुं न
मैं भव कूप ॥
बलबुद्घि विघा देहु मोहि,
सुनहु सरस्वती मातु ।
रामसागर अधम को आश्रय तू दे
दातु ॥
॥ श्री गायत्री चालीसा ॥
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन
ज्योति प्रचण्ड ॥
शान्ति कान्ति जागृत
प्रगति रचना शक्ति अखण्ड ॥
१॥
जगत जननी मङ्गल
करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन
काम ॥ २॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी ।
गायत्री नित कलिमल दहनी ॥॥
अक्षर चौविस परम पुनीता ।
इनमें बसें शास्त्र
श्रुति गीता ॥॥
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा ।
सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥॥
हंसारूढ सितंबर धारी ।
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-
बिहारी ॥॥
पुस्तक पुष्प कमण्डलु
माला ।
शुभ्र वर्ण तनु नयन
विशाला ॥॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई ।
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई
॥॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया ।
निराकार की अद्भुत माया ॥॥
तुम्हरी शरण गहै जो कोई ।
तरै सकल संकट सों सोई ॥॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।
दिपै
तुम्हारी ज्योति निराली ॥॥
तुम्हरी महिमा पार न पावैं
।
जो शारद शत मुख गुन गावैं
॥॥
चार वेद की मात पुनीता ।
तुम
ब्रह्माणी गौरी सीता ॥॥
महामन्त्र जितने जग माहीं ।
कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥
सुमिरत हिय में ज्ञान
प्रकासै ।
आलस पाप अविद्या नासै ॥॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी ।
कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर
जेते ।
तुम सों पावें सुरता तेते
॥॥
तुम भक्तन की भक्त
तुम्हारे ।
जननिहिं पुत्र प्राण ते
प्यारे ॥॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।
जय जय जय
त्रिपदा भयहारी ॥॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना ।
तुम सम अधिक न जगमे आना ॥॥
तुमहिं जानि कछु रहै न
शेषा ।
तुमहिं पाय कछु रहै न
क्लेसा ॥॥
जानत तुमहिं तुमहिं व्है
जाई ।
पारस परसि कुधातु सुहाई ॥॥
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई
।
माता तुम सब ठौर समाई ॥॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड
घनेरे ।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे
॥॥
सकल सृष्टि की प्राण
विधाता ।
पालक पोषक नाशक त्राता ॥॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी ।
तुम सन तरे पातकी भारी ॥॥
जापर कृपा तुम्हारी होई ।
तापर कृपा करें सब कोई ॥॥
मंद बुद्धि ते बुधि बल
पावें ।
रोगी रोग रहित हो जावें ॥॥
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा ।
नाशै दुःख हरै भव भीरा ॥॥
गृह क्लेश चित
चिन्ता भारी ।
नासै गायत्री भय हारी ॥॥
सन्तति हीन सुसन्तति पावें
।
सुख संपति युत मोद मनावें
॥॥
भूत पिशाच सबै भय खावें ।
यम के दूत निकट नहिं आवें
॥॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई ।
अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥॥
घर वर सुख प्रद लहैं
कुमारी ।
विधवा रहें सत्य व्रत
धारी ॥॥
जयति जयति जगदंब भवानी ।
तुम सम ओर दयालु न दानी ॥॥
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे ।
सो साधन को सफल बनावे ॥॥
सुमिरन करे सुरूचि बडभागी ।
लहै मनोरथ गृही विरागी ॥॥
अष्ट
सिद्धि नवनिधि की दाता ।
सब समर्थ गायत्री माता ॥॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी ।
आरत अर्थी चिन्तित भोगी ॥॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें ।
सो सो मन वांछित फल पावें
॥॥
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ
।
धन वैभव यश तेज उछाउ ॥॥
सकल बढें उपजें सुख नाना ।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
यह चालीसा भक्ति युत पाठ
करै जो कोई ।
तापर
कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय
॥
ज्योति प्रचण्ड ॥
शान्ति कान्ति जागृत
प्रगति रचना शक्ति अखण्ड ॥
१॥
जगत जननी मङ्गल
करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन
काम ॥ २॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी ।
गायत्री नित कलिमल दहनी ॥॥
अक्षर चौविस परम पुनीता ।
इनमें बसें शास्त्र
श्रुति गीता ॥॥
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा ।
सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥॥
हंसारूढ सितंबर धारी ।
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-
बिहारी ॥॥
पुस्तक पुष्प कमण्डलु
माला ।
शुभ्र वर्ण तनु नयन
विशाला ॥॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई ।
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई
॥॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया ।
निराकार की अद्भुत माया ॥॥
तुम्हरी शरण गहै जो कोई ।
तरै सकल संकट सों सोई ॥॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।
दिपै
तुम्हारी ज्योति निराली ॥॥
तुम्हरी महिमा पार न पावैं
।
जो शारद शत मुख गुन गावैं
॥॥
चार वेद की मात पुनीता ।
तुम
ब्रह्माणी गौरी सीता ॥॥
महामन्त्र जितने जग माहीं ।
कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥
सुमिरत हिय में ज्ञान
प्रकासै ।
आलस पाप अविद्या नासै ॥॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी ।
कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर
जेते ।
तुम सों पावें सुरता तेते
॥॥
तुम भक्तन की भक्त
तुम्हारे ।
जननिहिं पुत्र प्राण ते
प्यारे ॥॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।
जय जय जय
त्रिपदा भयहारी ॥॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना ।
तुम सम अधिक न जगमे आना ॥॥
तुमहिं जानि कछु रहै न
शेषा ।
तुमहिं पाय कछु रहै न
क्लेसा ॥॥
जानत तुमहिं तुमहिं व्है
जाई ।
पारस परसि कुधातु सुहाई ॥॥
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई
।
माता तुम सब ठौर समाई ॥॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड
घनेरे ।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे
॥॥
सकल सृष्टि की प्राण
विधाता ।
पालक पोषक नाशक त्राता ॥॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी ।
तुम सन तरे पातकी भारी ॥॥
जापर कृपा तुम्हारी होई ।
तापर कृपा करें सब कोई ॥॥
मंद बुद्धि ते बुधि बल
पावें ।
रोगी रोग रहित हो जावें ॥॥
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा ।
नाशै दुःख हरै भव भीरा ॥॥
गृह क्लेश चित
चिन्ता भारी ।
नासै गायत्री भय हारी ॥॥
सन्तति हीन सुसन्तति पावें
।
सुख संपति युत मोद मनावें
॥॥
भूत पिशाच सबै भय खावें ।
यम के दूत निकट नहिं आवें
॥॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई ।
अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥॥
घर वर सुख प्रद लहैं
कुमारी ।
विधवा रहें सत्य व्रत
धारी ॥॥
जयति जयति जगदंब भवानी ।
तुम सम ओर दयालु न दानी ॥॥
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे ।
सो साधन को सफल बनावे ॥॥
सुमिरन करे सुरूचि बडभागी ।
लहै मनोरथ गृही विरागी ॥॥
अष्ट
सिद्धि नवनिधि की दाता ।
सब समर्थ गायत्री माता ॥॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी ।
आरत अर्थी चिन्तित भोगी ॥॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें ।
सो सो मन वांछित फल पावें
॥॥
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ
।
धन वैभव यश तेज उछाउ ॥॥
सकल बढें उपजें सुख नाना ।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
यह चालीसा भक्ति युत पाठ
करै जो कोई ।
तापर
कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय
॥
Tuesday, February 8, 2011
॥श्री हनुमान चालीसा ॥
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज
मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके,
सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेस बिकार॥
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि -पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के
संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज
प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे
को रसिया। राम लखन सीता मन
बसिया॥
सूक्ष्म रूप
धरि सियहिं दिखावा। बिकट
रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ
लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार
सुग्रीवहिं कीन्हा। राम
मिलाय राज पद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन
माना। लंकेस्वर भए सब जग
जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख
माही। जलधि लाँधि गये अचरज
नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे
तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत
न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत
निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै। मन
क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन
के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ
अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के
दाता। अस बर दीन
जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाई।
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढै हनुमान चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल
मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय
बसहु सुर भूप॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज
मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके,
सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेस बिकार॥
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि -पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के
संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज
प्रताप महा जग बंदन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे
को रसिया। राम लखन सीता मन
बसिया॥
सूक्ष्म रूप
धरि सियहिं दिखावा। बिकट
रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचन्द्र के काज सँवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बडाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ
लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार
सुग्रीवहिं कीन्हा। राम
मिलाय राज पद दीन्हा।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन
माना। लंकेस्वर भए सब जग
जाना॥
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख
माही। जलधि लाँधि गये अचरज
नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे
तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत
न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत
निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुडावै। मन
क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन
के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोइ लावै। सोइ
अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के
दाता। अस बर दीन
जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाई।
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढै हनुमान चलीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल
मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय
बसहु सुर भूप॥
Monday, February 7, 2011
विद्या प्राप्ति के कुछ अचूक उपाय
• पूर्व की तरफ सिर करके
सोने से
विद्या की प्राप्ति होती है।
• विद्वानो के मत से
विद्या प्राप्ति हेतु ४
मुखी एवं ६ मुखी रूद्राक्ष
लाल धागे मे धारण करने से
व्यक्ति की बुद्धि तीव्र
ओर कुशाग्र एवं विद्या,
ज्ञान, उत्तम
वाणी की प्राप्त होकर जीवन
मे रचनात्मकता आति है
• पढाई मेज पर स्फटिक
का श्री यंत्र स्थापीत
करने से स्मरण
शक्ति तीव्रे होती हैं एवं
खराब विचार दूर होकर उत्तम
प्रकार
की चिंताधारा उत्पन्न
होती हैं, एवं
मां सरस्वती और
लक्ष्मी का आशिर्वाद सदैव
बना रेहता हैं।
• अपने पूजा स्थान पर
सरस्वती यंत्र स्थापीत कर
प्रति दिन धूप- दीप करने से
मां सरस्वती का आशिर्वाद
एवं कृपा सदैव
बनी रेहती हैं।
• पढाई करते समय पूर्व
या उत्तर दिशा की तरफ मुख
कर कर पढाई करें।
• पढाई करते समय स्फेद
या हलके रंग के
कपडो का चुनाव करे
ताकी ……….
• पढाई की किताब में
मौली का टुकडा रखने से
ज्ञान एवं विद्या ……………
• किताब में मोर के पंख
रखने से लाभ होता हैं।
• ज्ञान मुद्रा का प्रति-
दिन मात्र ५ मिनिट प्रयोग
करने से स्मरण
शक्ति …………….
• पढाई करने वाली मेज(टेबल)
पर शीशा नहीं रखना चहीये।
शीशा रखने से मानसिक
……………
• पढाई के समय अपने पीछे
खाली जगा न रखे अर्थात ठोस
दीवार की और पीठ कर ……………
• अपनी बायीं (राईट हेंड) और
पानी से भरा ग्लास रखें
…………..
• मेज(टेबल) पर यथा संभव कम
सामग्री रखे उस्से
एकाग्रता …………..
• मेज(टेबल) को दीवार से
थोडा दूर रखे सटाकर ………….
• रात को सोने से पूर्व
चांदी के ग्लास मे
पानी भरकर ……….
• भोजन करते समय चांदी के
बरतनो का उपयोग करने ………
• बच्चो को सोमवार का व्रत
कर शिव मंदिर में ………….
• बुध कि होरा विद्या-
बुद्धि अर्थात पढाई के ……..
• विद्वानो के मत से काँसे
के बर्तन में ………..
• अंजीर को बादाम एवं
पिस्ता के …………
• प्रतिदिन सूर्यनमस्कार
करने और सूर्य को…………..
• लोहे के बर्तन में भोजन
करने से बुद्धि का ………..
• अष्टमी को नारियल ………….
• स्मरण शक्ति को प्रबल
करने के लिये ……….
स्मरण शक्ति को प्रबल करने
के लिये ………………
अन्य अचूक प्रभावशाली उपाय
• बुधवार के दिन मंत्र
सिद्ध पूर्ण प्राण
प्रतिष्ठित एवं पूर्ण
चैतन्य युक्त सरस्वती कवच
को धारण करें।
• मंत्र सिद्ध पूर्ण प्राण
प्रतिष्ठित एवं पूर्ण
चैतन्य युक्त चार और
छः मुखी रुद्राक्ष धारण
करने से भी स्मरण
शक्ति बढती हैं।
• शुद्ध पन्ने (Emrald) रत्न
को अभिमंत्रीत कर धारण
करने से लाभ होता हैं।
• अपनी पूजन स्थान में
या पढाई करने वाले स्थान
या रुम में मंत्र सिद्ध
पूर्ण प्राण प्रतिष्ठित
एवं पूर्ण चैतन्य युक्त
सरस्वती यंत्र स्थापीत
करने से लाभ प्राप्त
होता हैं।
• हरे मरगच या हकीक
की माला………….
• परीक्षा में उत्तीर्ण
होने हेतु लाल रंग की कलम
(पैन) लें ………..
• मन कि एकाग्रता हेतु
प्रतिदिन प्राणायाम करें।
विद्यारंभ करने से पूर
भी प्राणायाम करना लाभ
प्रद होता हैं। प्राणायाम
से शरीर में शक्ति का संचार
होता हैं और
स्फूर्ति उत्पन्न
होती हैं।
सोने से पूर्व
सरस्वती मंत्र का जप करे
एवं सोते समय
भी सरस्वती मंत्र का जप
करते रहें।
परिक्षा के लिये प्रस्थान
करेने से पूर्व गणेश जी के
निम्न मंत्र
का ध्यानपूर्वक जप करके घर
से बाहर निकले करें।
ॐ वक्रतुंड महाकाय सूर्य
कोटि समप्रभः।
निर्विघ्नम्कुरु मे देव
सर्व कार्येषु सर्वदा॥
प्रश्न पत्र पर पर कुछ
भी लिखने से पूर्व उपर छोटे
अक्षरो में ………………… .
उपरोक्त प्रयोग के करने से
अवश्य लाभ प्राप्त
होता हैं।
…
सोने से
विद्या की प्राप्ति होती है।
• विद्वानो के मत से
विद्या प्राप्ति हेतु ४
मुखी एवं ६ मुखी रूद्राक्ष
लाल धागे मे धारण करने से
व्यक्ति की बुद्धि तीव्र
ओर कुशाग्र एवं विद्या,
ज्ञान, उत्तम
वाणी की प्राप्त होकर जीवन
मे रचनात्मकता आति है
• पढाई मेज पर स्फटिक
का श्री यंत्र स्थापीत
करने से स्मरण
शक्ति तीव्रे होती हैं एवं
खराब विचार दूर होकर उत्तम
प्रकार
की चिंताधारा उत्पन्न
होती हैं, एवं
मां सरस्वती और
लक्ष्मी का आशिर्वाद सदैव
बना रेहता हैं।
• अपने पूजा स्थान पर
सरस्वती यंत्र स्थापीत कर
प्रति दिन धूप- दीप करने से
मां सरस्वती का आशिर्वाद
एवं कृपा सदैव
बनी रेहती हैं।
• पढाई करते समय पूर्व
या उत्तर दिशा की तरफ मुख
कर कर पढाई करें।
• पढाई करते समय स्फेद
या हलके रंग के
कपडो का चुनाव करे
ताकी ……….
• पढाई की किताब में
मौली का टुकडा रखने से
ज्ञान एवं विद्या ……………
• किताब में मोर के पंख
रखने से लाभ होता हैं।
• ज्ञान मुद्रा का प्रति-
दिन मात्र ५ मिनिट प्रयोग
करने से स्मरण
शक्ति …………….
• पढाई करने वाली मेज(टेबल)
पर शीशा नहीं रखना चहीये।
शीशा रखने से मानसिक
……………
• पढाई के समय अपने पीछे
खाली जगा न रखे अर्थात ठोस
दीवार की और पीठ कर ……………
• अपनी बायीं (राईट हेंड) और
पानी से भरा ग्लास रखें
…………..
• मेज(टेबल) पर यथा संभव कम
सामग्री रखे उस्से
एकाग्रता …………..
• मेज(टेबल) को दीवार से
थोडा दूर रखे सटाकर ………….
• रात को सोने से पूर्व
चांदी के ग्लास मे
पानी भरकर ……….
• भोजन करते समय चांदी के
बरतनो का उपयोग करने ………
• बच्चो को सोमवार का व्रत
कर शिव मंदिर में ………….
• बुध कि होरा विद्या-
बुद्धि अर्थात पढाई के ……..
• विद्वानो के मत से काँसे
के बर्तन में ………..
• अंजीर को बादाम एवं
पिस्ता के …………
• प्रतिदिन सूर्यनमस्कार
करने और सूर्य को…………..
• लोहे के बर्तन में भोजन
करने से बुद्धि का ………..
• अष्टमी को नारियल ………….
• स्मरण शक्ति को प्रबल
करने के लिये ……….
स्मरण शक्ति को प्रबल करने
के लिये ………………
अन्य अचूक प्रभावशाली उपाय
• बुधवार के दिन मंत्र
सिद्ध पूर्ण प्राण
प्रतिष्ठित एवं पूर्ण
चैतन्य युक्त सरस्वती कवच
को धारण करें।
• मंत्र सिद्ध पूर्ण प्राण
प्रतिष्ठित एवं पूर्ण
चैतन्य युक्त चार और
छः मुखी रुद्राक्ष धारण
करने से भी स्मरण
शक्ति बढती हैं।
• शुद्ध पन्ने (Emrald) रत्न
को अभिमंत्रीत कर धारण
करने से लाभ होता हैं।
• अपनी पूजन स्थान में
या पढाई करने वाले स्थान
या रुम में मंत्र सिद्ध
पूर्ण प्राण प्रतिष्ठित
एवं पूर्ण चैतन्य युक्त
सरस्वती यंत्र स्थापीत
करने से लाभ प्राप्त
होता हैं।
• हरे मरगच या हकीक
की माला………….
• परीक्षा में उत्तीर्ण
होने हेतु लाल रंग की कलम
(पैन) लें ………..
• मन कि एकाग्रता हेतु
प्रतिदिन प्राणायाम करें।
विद्यारंभ करने से पूर
भी प्राणायाम करना लाभ
प्रद होता हैं। प्राणायाम
से शरीर में शक्ति का संचार
होता हैं और
स्फूर्ति उत्पन्न
होती हैं।
सोने से पूर्व
सरस्वती मंत्र का जप करे
एवं सोते समय
भी सरस्वती मंत्र का जप
करते रहें।
परिक्षा के लिये प्रस्थान
करेने से पूर्व गणेश जी के
निम्न मंत्र
का ध्यानपूर्वक जप करके घर
से बाहर निकले करें।
ॐ वक्रतुंड महाकाय सूर्य
कोटि समप्रभः।
निर्विघ्नम्कुरु मे देव
सर्व कार्येषु सर्वदा॥
प्रश्न पत्र पर पर कुछ
भी लिखने से पूर्व उपर छोटे
अक्षरो में ………………… .
उपरोक्त प्रयोग के करने से
अवश्य लाभ प्राप्त
होता हैं।
…
॥ सरस्वती अष्टोत्तरनामावलीः ॥
॥
सरस्वती अष्टोत्तरनामावलीः ॥
1. ॐ सरस्वत्यै नमः ॥
2. ॐ महाभद्रायै नमः ॥
3. ॐ महामायायै नमः ॥
4. ॐ वरप्रदायै नमः ॥
5. ॐ श्रीप्रदायै नमः ॥
6. ॐ पद्मनिलयायै नमः ॥
7. ॐ पद्माक्ष्यै नमः ॥
8. ॐ पद्मवक्त्रकायै नमः ॥
9. ॐ शिवानुजायै नमः ॥
10. ॐ पुस्तकभृते नमः ॥
11. ॐ ज्ञानमुद्रायै नमः ॥
12. ॐ रमायै नमः ॥
13. ॐ परायै नमः ॥
14. ॐ कामरूपायै नमः ॥
15. ॐ महाविद्यायै नमः ॥
16. ॐ महापातक नाशिन्यै
नमः ॥
17. ॐ महाश्रयायै नमः ॥
18. ॐ मालिन्यै नमः ॥
19. ॐ महाभोगायै नमः ॥
20. ॐ महाभुजायै नमः ॥
21. ॐ महाभागायै नमः ॥
22. ॐ महोत्साहायै नमः ॥
23. ॐ दिव्याङ्गायै नमः ॥
24. ॐ सुरवन्दितायै नमः ॥
25. ॐ महाकाल्यै नमः ॥
26. ॐ महापाशायै नमः ॥
27. ॐ महाकारायै नमः ॥
28. ॐ महांकुशायै नमः ॥
29. ॐ पीतायै नमः ॥
30. ॐ विमलायै नमः ॥
31. ॐ विश्वायै नमः ॥
32. ॐ विद्युन्मालायै
नमः ॥
33. ॐ वैष्णव्यै नमः ॥
34. ॐ चन्द्रिकायै नमः ॥
35. ॐ चन्द्रवदनायै नमः ॥
36. ॐ
चन्द्रलेखाविभूषितायै
नमः ॥
37. ॐ सावित्यै नमः ॥
38. ॐ सुरसायै नमः ॥
39. ॐ देव्यै नमः ॥
40. ॐ दिव्यालंकारभूषितायै
नमः ॥
41. ॐ वाग्देव्यै नमः ॥
42. ॐ वसुदायै नमः ॥
43. ॐ तीव्रायै नमः ॥
44. ॐ महाभद्रायै नमः ॥
45. ॐ महाबलायै नमः ॥
46. ॐ भोगदायै नमः ॥
47. ॐ भारत्यै नमः ॥
48. ॐ भामायै नमः ॥
49. ॐ गोविन्दायै नमः ॥
50. ॐ गोमत्यै नमः ॥
51. ॐ शिवायै नमः ॥
52. ॐ जटिलायै नमः ॥
53. ॐ विन्ध्यावासायै
नमः ॥
54. ॐ
विन्ध्याचलविराजितायै
नमः ॥
55. ॐ चण्डिकायै नमः ॥
56. ॐ वैष्णव्यै नमः ॥
57. ॐ ब्राह्मयै नमः ॥
58. ॐ
ब्रह्मज्ञानैकसाधनायै
नमः ॥
59. ॐ सौदामन्यै नमः ॥
60. ॐ सुधामूर्त्यै नमः ॥
61. ॐ सुभद्रायै नमः ॥
62. ॐ सुरपूजितायै नमः ॥
63. ॐ सुवासिन्यै नमः ॥
64. ॐ सुनासायै नमः ॥
65. ॐ विनिद्रायै नमः ॥
66. ॐ पद्मलोचनायै नमः ॥
67. ॐ विद्यारूपायै नमः ॥
68. ॐ विशालाक्ष्यै नमः ॥
69. ॐ ब्रह्मजायायै नमः ॥
70. ॐ महाफलायै नमः ॥
71. ॐ त्रयीमूर्तये नमः ॥
72. ॐ त्रिकालज्ञायै नमः ॥
73. ॐ त्रिगुणायै नमः ॥
74. ॐ शास्त्ररूपिण्यै
नमः ॥
75. ॐ शंभासुरप्रमथिन्यै
नमः ॥
76. ॐ शुभदायै नमः ॥
77. ॐ स्वरात्मिकायै नमः ॥
78. ॐ रक्तबीजनिहन्त्र्यै
नमः ॥
79. ॐ चामुण्डायै नमः ॥
80. ॐ अम्बिकायै नमः ॥
81. ॐ मुण्डकायप्रहरणायै
नमः ॥
82. ॐ धूम्रलोचनमदनायै
नमः ॥
83. ॐ सर्वदेवस्तुतायै
नमः ॥
84. ॐ सौम्यायै नमः ॥
85. ॐ सुरासुर नमस्कृतायै
नमः ॥
86. ॐ कालरात्र्यै नमः ॥
87. ॐ कलाधरायै नमः ॥
88. ॐ रूपसौभाग्यदायिन्यै
नमः ॥
89. ॐ वाग्देव्यै नमः ॥
90. ॐ वरारोहायै नमः ॥
91. ॐ वाराह्यै नमः ॥
92. ॐ वारिजासनायै नमः ॥
93. ॐ चित्रांबरायै नमः ॥
94. ॐ चित्रगन्धायै नमः ॥
95. ॐ
चित्रमाल्यविभूषितायै
नमः ॥
96. ॐ कान्तायै नमः ॥
97. ॐ कामप्रदायै नमः ॥
98. ॐ वन्द्यायै नमः ॥
99. ॐ विद्याधरसुपूजितायै
नमः ॥
100. ॐ श्वेताननायै नमः ॥
101. ॐ नीलभुजायै नमः ॥
102. ॐ चतुर्वर्गफलप्रदायै
नमः ॥
103. ॐ चतुरानन
साम्राज्यायै नमः ॥
104. ॐ रक्तमध्यायै नमः ॥
105. ॐ निरंजनायै नमः ॥
106. ॐ हंसासनायै नमः ॥
107. ॐ नीलजङ्घायै नमः ॥
108. ॐ
ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकायै
नमः ॥
॥॥
इति श्री सरस्वति अष्टोत्तरशत
नामावलिः ॥॥
सरस्वती अष्टोत्तरनामावलीः ॥
1. ॐ सरस्वत्यै नमः ॥
2. ॐ महाभद्रायै नमः ॥
3. ॐ महामायायै नमः ॥
4. ॐ वरप्रदायै नमः ॥
5. ॐ श्रीप्रदायै नमः ॥
6. ॐ पद्मनिलयायै नमः ॥
7. ॐ पद्माक्ष्यै नमः ॥
8. ॐ पद्मवक्त्रकायै नमः ॥
9. ॐ शिवानुजायै नमः ॥
10. ॐ पुस्तकभृते नमः ॥
11. ॐ ज्ञानमुद्रायै नमः ॥
12. ॐ रमायै नमः ॥
13. ॐ परायै नमः ॥
14. ॐ कामरूपायै नमः ॥
15. ॐ महाविद्यायै नमः ॥
16. ॐ महापातक नाशिन्यै
नमः ॥
17. ॐ महाश्रयायै नमः ॥
18. ॐ मालिन्यै नमः ॥
19. ॐ महाभोगायै नमः ॥
20. ॐ महाभुजायै नमः ॥
21. ॐ महाभागायै नमः ॥
22. ॐ महोत्साहायै नमः ॥
23. ॐ दिव्याङ्गायै नमः ॥
24. ॐ सुरवन्दितायै नमः ॥
25. ॐ महाकाल्यै नमः ॥
26. ॐ महापाशायै नमः ॥
27. ॐ महाकारायै नमः ॥
28. ॐ महांकुशायै नमः ॥
29. ॐ पीतायै नमः ॥
30. ॐ विमलायै नमः ॥
31. ॐ विश्वायै नमः ॥
32. ॐ विद्युन्मालायै
नमः ॥
33. ॐ वैष्णव्यै नमः ॥
34. ॐ चन्द्रिकायै नमः ॥
35. ॐ चन्द्रवदनायै नमः ॥
36. ॐ
चन्द्रलेखाविभूषितायै
नमः ॥
37. ॐ सावित्यै नमः ॥
38. ॐ सुरसायै नमः ॥
39. ॐ देव्यै नमः ॥
40. ॐ दिव्यालंकारभूषितायै
नमः ॥
41. ॐ वाग्देव्यै नमः ॥
42. ॐ वसुदायै नमः ॥
43. ॐ तीव्रायै नमः ॥
44. ॐ महाभद्रायै नमः ॥
45. ॐ महाबलायै नमः ॥
46. ॐ भोगदायै नमः ॥
47. ॐ भारत्यै नमः ॥
48. ॐ भामायै नमः ॥
49. ॐ गोविन्दायै नमः ॥
50. ॐ गोमत्यै नमः ॥
51. ॐ शिवायै नमः ॥
52. ॐ जटिलायै नमः ॥
53. ॐ विन्ध्यावासायै
नमः ॥
54. ॐ
विन्ध्याचलविराजितायै
नमः ॥
55. ॐ चण्डिकायै नमः ॥
56. ॐ वैष्णव्यै नमः ॥
57. ॐ ब्राह्मयै नमः ॥
58. ॐ
ब्रह्मज्ञानैकसाधनायै
नमः ॥
59. ॐ सौदामन्यै नमः ॥
60. ॐ सुधामूर्त्यै नमः ॥
61. ॐ सुभद्रायै नमः ॥
62. ॐ सुरपूजितायै नमः ॥
63. ॐ सुवासिन्यै नमः ॥
64. ॐ सुनासायै नमः ॥
65. ॐ विनिद्रायै नमः ॥
66. ॐ पद्मलोचनायै नमः ॥
67. ॐ विद्यारूपायै नमः ॥
68. ॐ विशालाक्ष्यै नमः ॥
69. ॐ ब्रह्मजायायै नमः ॥
70. ॐ महाफलायै नमः ॥
71. ॐ त्रयीमूर्तये नमः ॥
72. ॐ त्रिकालज्ञायै नमः ॥
73. ॐ त्रिगुणायै नमः ॥
74. ॐ शास्त्ररूपिण्यै
नमः ॥
75. ॐ शंभासुरप्रमथिन्यै
नमः ॥
76. ॐ शुभदायै नमः ॥
77. ॐ स्वरात्मिकायै नमः ॥
78. ॐ रक्तबीजनिहन्त्र्यै
नमः ॥
79. ॐ चामुण्डायै नमः ॥
80. ॐ अम्बिकायै नमः ॥
81. ॐ मुण्डकायप्रहरणायै
नमः ॥
82. ॐ धूम्रलोचनमदनायै
नमः ॥
83. ॐ सर्वदेवस्तुतायै
नमः ॥
84. ॐ सौम्यायै नमः ॥
85. ॐ सुरासुर नमस्कृतायै
नमः ॥
86. ॐ कालरात्र्यै नमः ॥
87. ॐ कलाधरायै नमः ॥
88. ॐ रूपसौभाग्यदायिन्यै
नमः ॥
89. ॐ वाग्देव्यै नमः ॥
90. ॐ वरारोहायै नमः ॥
91. ॐ वाराह्यै नमः ॥
92. ॐ वारिजासनायै नमः ॥
93. ॐ चित्रांबरायै नमः ॥
94. ॐ चित्रगन्धायै नमः ॥
95. ॐ
चित्रमाल्यविभूषितायै
नमः ॥
96. ॐ कान्तायै नमः ॥
97. ॐ कामप्रदायै नमः ॥
98. ॐ वन्द्यायै नमः ॥
99. ॐ विद्याधरसुपूजितायै
नमः ॥
100. ॐ श्वेताननायै नमः ॥
101. ॐ नीलभुजायै नमः ॥
102. ॐ चतुर्वर्गफलप्रदायै
नमः ॥
103. ॐ चतुरानन
साम्राज्यायै नमः ॥
104. ॐ रक्तमध्यायै नमः ॥
105. ॐ निरंजनायै नमः ॥
106. ॐ हंसासनायै नमः ॥
107. ॐ नीलजङ्घायै नमः ॥
108. ॐ
ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकायै
नमः ॥
॥॥
इति श्री सरस्वति अष्टोत्तरशत
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